नारायणी धाम में परम विश्राम दिवस पर उमड़ा श्रद्धा का महासागर

नारायणी धाम में परम विश्राम दिवस पर उमड़ा श्रद्धा का महासागर

अलवर :  राजस्थान की सुरम्य अरावली पर्वतमालाओं की गोद में स्थित सरिस्का वन क्षेत्र का 'नारायणी धाम आश्रम' इन दिनों भक्ति की दिव्य ऊर्जा से स्पंदित हो उठा। परम पूज्य सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी के 'परम विश्राम दिवस' के पावन उपलक्ष्य में आयोजित दो दिवसीय महोत्सव ने न केवल आध्यात्मिक चेतना का संचार किया, बल्कि मानवता के नए सोपानों को भी परिभाषित किया।4 और 5 जुलाई को आयोजित इस अनुष्ठान में देश के कोने-कोने से पधारे हजारों श्रद्धालुओं ने सहभागिता की। कार्यक्रम का श्रीगणेश 'श्री अवधूत देवीदास चरित' के अखंड पाठ और ध्यान-सत्संग के साथ हुआ। जब पूज्य गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी और पूज्या गुरु माँ कीर्ति जी का आगमन हुआ, तो वातावरण गुरु-जयकारों और पुष्पवर्षा से गुंजायमान हो उठा। सतगुरु की समाधि पर शीश नवाते हुए श्रद्धालुओं की आँखों में श्रद्धा के अश्रु और हृदय में कृतज्ञता का भाव स्पष्ट दिखाई दे रहा था।महोत्सव के द्वितीय दिवस पर निकाली गई भव्य कलश यात्रा आकर्षण का केंद्र रही। नारायणी माता मंदिर से लेकर आश्रम तक, महिलाओं द्वारा सिर पर कलश धारण किए हुए गुरु महामंत्र के उद्घोष ने पूरी घाटी को पवित्र कर दिया। समाधि स्थल पर जलार्पण और बाबा की धूनी की परिक्रमा करते हुए भक्त मानों स्वयं को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर रहे थे।इस आयोजन का सबसे सशक्त पक्ष पूज्य गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी द्वारा रचित "मानव धर्म शास्त्र" का संदेश रहा। वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि यह ग्रंथ केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। यह धर्मशास्त्र जाति-पांति, संकीर्णता और पाखंड के बंधनों को तोड़कर 'मानवता' को ही सबसे बड़ा धर्म बताता है। पर्यावरण संरक्षण, सदाचार और सामाजिक समरसता को अपना आधार बनाकर यह शास्त्र एक उन्नत समाज के निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर रहा है।परम विश्राम दिवस' का यह महोत्सव केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं था, बल्कि यह समाज को प्रेम, सेवा और त्याग के सूत्र में पिरोने का एक संकल्प था। अवधूत देवीदास सेवा संस्थान द्वारा शिक्षा, सेवा और योग के माध्यम से किए जा रहे कार्य यह सिद्ध करते हैं कि सच्ची आध्यात्मिकता वही है जो मनुष्य के भीतर के अंधकार को मिटाकर उसे समाज के लिए प्रकाश पुंज बना दे। कार्यक्रम के समापन पर भक्तों का यह संकल्प कि वे 'मानव धर्म' की राह पर चलेंगे, इस आयोजन की सबसे बड़ी सार्थकता सिद्ध हुई।जहाँ सेवा ही धर्म हो और प्रेम ही प्रार्थना, वहीं साक्षात परमात्मा का वास होता है। नारायणी धाम का यह महोत्सव मानवता के उत्थान की उसी दिव्य परंपरा का एक जीवंत अध्याय है।


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